मेरा सपना
पहली बार मेरी ज़िंदगी में बिहार की चुनावी रैलियों में शिक्षा, नौकरी, विकास जैसी बातें सुनाई दीं—और कम जातीय राजनीति। हर पार्टी, यहाँ तक कि RJD भी, इसी सुर में बोली। और जब नेता बदलते हैं, तो लोग भी बदल जाते हैं। लोगों ने पहली बार जाति से ऊपर उठकर उम्मीद को चुना। सरकार भले ही वही बनी हो, पर यह जनमत पहले जैसा बिल्कुल नहीं है। इस बार जनता ने कुछ नया माँगा है—एक अलग तरह का भविष्य। बिहार में पैदा होना मतलब राजनीति और जाति—ये दोनों बातों को बिना सीखे ही सीख जाना। इतनी गहराई से ये चीज़ें ज़िंदगी में घुली होती हैं कि समझ नहीं आता कि राजनीति कहाँ खत्म होती है और जाति कहाँ शुरू। मैं 90 के आख़िर में पैदा हुआ, और बचपन में ही एक अजीब सा डर मेरे अंदर बैठ गया था—कहीं मैं भी उन “भूरा बाल” में न गिना जाऊँ जिनके बारे में लालू जी ने कभी कहा था। बचपन इतना बोझ नहीं उठाता, लेकिन बिहार में कुछ चीज़ें जल्दी सीखनी पड़ती हैं। और फिर आया 2018। सरकारी नौकरी के कई असफल प्रयासों के बाद, सपने देखना भी भारी लगने लगा था। माँ ने अपने पूरे ₹3000—जो उनकी सारी बचत थी—मेरे हाथ में रखे। ऐसा लगा जैसे वो सिर्फ ...